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तेरी लाज मेरे हाथ है भगवान।

Posted On: 18 Nov, 2011 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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हे कृपा निधान , हे भगवान, मैं अपने आपको तुम्हें समर्पित कर रहा हूं। कृपया मुझे कुर्सी दे दो नाथ। फिर जीवन भर जोडूंगा तेरा हाथ। हे नाथ तुने सबकी इच्छाओं को पूरा किया है। तेरी कृपा से लंगड़ा पर्वत चढ़ जाता है ,अंधा देखने लगता है, बहरा सुनने लगता है, गूंगा बोलने लगता है। तेरी कृपा मात्र से आदमी को क्या कुछ नहीं मिल जाता है। हे नटवर तुमने अपने भक्तों को यह बचन दिया था कि तेरी षरण में जो आ जाता है, उसके तुम सारे दुख हर लेते हो । उसे तुम मनोवांछित फल प्रदान कर देते हो। तुमने भक्तों से अहंकार छोड़ने को कहा है, मैंने अहंकार छोड़ दिया है। मैं अब तुम्हारी षरण में हूं। मैं अपने बल पर यह चुनाव नहीं जीत सकता नटवर। तुम भक्तों के कल्याण के लिए धरती पर जन्म तक ग्रहण कर लेते हो। क्या तुम मेरी चुनावी नैया पार करने के लिए एक चमत्कार तक नहीं कर सकते। तुमने दूसरे के भलाई के बारे में सोंचने को कहा था, इसलिए मै दूसरे के बारे में सोच रहा हूं। मेरे विरूद्ध चुनाव लड़ रहा षख्स माया केे वषीभूत है नाथ। उसे हित अनहित का ध्यान नहीं है। मैं नहीं चाहता कि वह चुनाव जीतकर माया के अधीन हो। इसलिए उसे माया से दूर करना चाहता हूं। पर वह मेरी सुनता हीं नहीं। चुनाव में मुझसे जो उसकी बढ़त दिखाई दे रही है वह क्षणिक सुख है। जिसे वह स्थायी समझने की भुल कर रहा है। मैं नहीं चाहता कि मेरा विरोधी माया ग्रस्त हो। माया बड़ी बलवती है। जब वह भगवान को नहीं छोड़ती तो भला उसे कैसे छोड़ेगी। उसे तुम माया से मुक्त कर दो नाथ। वह मेरी बात नहीं सुन रहा है नटवर। मैंे उसे षाम- दाम -दंड- भेद दिखाकर थक गया हूं। वह नहीं माना। अब तुमपर हीं आस टिकी है ,तेरी हीं कृपा पर हीं मेरी सास टिकी है। हे कृष्ण कन्हैया तुम मुझे मेरे विरोधियों से मुक्ति प्रदान कर दो। उसे तुम त्याग का उपदेष पिला दो। उसे तुम बता दो कि यह जीवन नष्वर है। इसके लिए मोहग्रस्त होना कहां की बुद्धिमानी है? इसके लिए वह क्यों माया- मोह कर रहा हैं । वह क्यों दूसरे के हक को छीनने की कोषिष कर रह है। क्यों सांसारिकता में उलझ रहा है। अन्त समय कोई उसके साथ नहीं जाएगा। उन्हें यह बता दो कि सिंकन्दर विष्व विजयी होकर भी इस संसार से खाली हाथ हीं गया था। उसे तुम यह बता दो कि हर जीव में वह खुद को देखेगा तो उसका द्वैत मिट जाएगा, दूसरे की उपलब्धि अपनी नजर आएगी। फिर उसे चुनाव लड़ने कि आवष्यकता हीं नहीं महसूस होगी। मैं चुनाव हार कर कहां मंुह दिखाउंगा कृष्ण कन्हैया। इसलिए सन्यास ले लूंगा। लेकिन मेरा सन्यास मजबूरी में लिया गया होगा। क्या यह कायरता नहीं होगी ? क्या यह अध्यात्म के मूल सिद्धान्त के विरूद्ध नहीं होगा? अध्यात्म की पुस्तकों में कहा गया है कि, सन्यास का भाव हृदय से उठना चाहिए। और सन्यास गृहस्थ आश्रम में रहकर भी फलीभूत हो सकता है। समस्याओं से भागकर जंगल चले जाना भगेड़ूपन है। मेरी लाज अब तेरे हाथ में है गिरिधर। और तेरी लाज मेरे हाथों में, क्योंकि अगर यह चुनाव मैं हार गया, तो तुम्हारे इस कथन पर कोई विष्वास नहीं करेगा, कि जो अपने आपको तुम्हें समर्पित कर देता है, उसके तुम सारे कष्ट दूर कर देते हो।

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

manojjohny के द्वारा
November 20, 2011

बहुत अच्छे तरीके से लिखा गया ब्याङ्ग है। http://www.manojjohny.com

shaktisingh के द्वारा
November 19, 2011

कुछ अलग हटके बेहतर लेख


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