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परिवारवाद के फायदे

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राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ लोग गाहे-बगाहे लामबंद होते रहते हैं और ऐसी फिजा बनाते हैं। मानों परिवारवाद को उखाड़ फेंकेंगे । लेकिन परिवारवाद पहले भी था और आगे भी रहेगा। कोई उसका बाल बांका नहीं कर सकता है। जो लोग राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं वो इसके फायदे को नहीं जानते हैं। और न हीं उन्हें विज्ञान की कोई जानकारी है। विज्ञान का सिद्वान्त कहता है कि पिता का गुण पुत्र में स्वयमेव आ जाता है। मतलब की पिता की अगर राजनीति करते- करते चप्पल घिस गई है तो पुत्र को चप्पल घिसने की कोई आवष्यकता नहीं है। अब वह मलाई काट सकता है। इसलिए राजनीति में परिवारवाद के फायदे जाननेवाले मौन रहते हैं जबकि कम जानकार षोरगुल करते हैं। ठीक वैसे हीं जैसे कि विद्वता आ जाने पर नम्रता आ जाती है। और इसके विपरित कम जानकारी हीनता को जन्म देती है। मेरा मानना है कि राजनीति में परिवारवाद का विरोध करने वाले हीनता की ग्रन्थि से पीडित हैं। उनका इलाज होना चाहिए।
यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि जो अपने आपसे प्यार नहीं करता। वह किसी और को भी प्यार नहीं कर सकता। अगर कोई नेता अपने बेटे को प्यार नहीं करता तोक्या वह आपको प्यार करेगा ? अगर कोई नेता अपने बेटे को नेता बनना चाहता है तो क्या बुरा करता है ? क्या आप सोंचते हैं कि जो अपनेे बेटे को नेता नहीं बनाएगा वह हमें या आपको नेता बना देगा। परिवारवाद का विरोध करने वाले इस मनोवैज्ञानिक सत्य की अवहेलना करते हैं। मेरा तो मानना है कि नेता पुत्रों में पिता सें इतने गुण आ जाते हैं कि जीवन भर वह लोगों को उल्लू बना सकता है। इसलिए नेता पुत्रों को राजनीति में आरक्षण मिलना चाहिए। यह ठीक नहीं की कोई भी ऐरू- गैरू चुनाव लड़ कर जीत जाए। और नेताजी के लाड़ले मुंह ताकते रह जाएं।
परिवारवाद के विरोध करने वाले को अपना मुंह बंद रखना चाहिए कारण कि नेता पुत्रों ने जीवन में कभी कोई बढि़यां काम कर दिया तो वे कहां मुंह दिखाएंगे ? इसलिए मेरा उनको सलाह है कि परिवारवाद का विरोध करके ज्यादा चालाक बनने कि कोषिष न करें और व्यवस्था जैसे चलती है वैसा चलने दें।

वैसे भी जिनको अपनी राजनीति चमकाने का मौका नहीं मिलता वो हीं परिवारवाद का जाप करने लगते हैं। और कुछ चाकरी करने लगते हैं।। राजनीति के खिलाड़ी बड़े नेताओं की गणेष प्रक्रिमा करते हैं और कुछ भोग लगाते हैं और बदले में प्रसाद पाते हैं। मैं अपनी बात समाप्त करने से पहले यह बता दूं मुझमें भी बचपन में नेतागिरी के गुण उभरने लगे थे। इसका कारण यह था कि मेरे पिताजी भी रोड़छाप नेता थे। उनके नेतागिरी प्रेम के चलते मेरी मां को बड़े पाॅपड़ बेलने पड़े थे। कारण कि मेरे पिताजी जीवनभर रोड़छाप नेता हीं रह गए उनको घोटाला-वोटाला करने का मौका नहीं मिला। इसलिए मेरी मां चाहती थीं कि पिता का रोग पुत्र को न लगे। मैं नेतागिरी फिल्ड से दूर रहूं इसके लिए उन्होंने मेरी महीनों ओझाई कराई तब जाकर मेरे उपर से राजनीति का भूत उतरा।

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

krishnashri के द्वारा
November 23, 2011

महोदय , बहुत सुन्दर प्रवाह पूर्ण रचना ,हास्य -व्यंग से भरपूर /आपको हार्दिक बधाई /

Rajkamal Sharma के द्वारा
November 22, 2011

प्रिय गोपाल जी ….. नमस्कार ! बहुत ही दिलचस्प और मजेदार वयंग्य जिसका कुछ असर आपने खुद अपने पर भी लिया ….. मुबारकबाद !

shashibhushan1959 के द्वारा
November 22, 2011

मान्यवर गोपाल जी सादर. बहुत अच्छी प्रवाहमय व्यंग रचना. बधाई.


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